नगरीय परिवेश में मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा की स्थिति (छत्तीसगढ़ के महासमुन्द जिले के महासमुन्द नगर के विशेष संदर्भ में)
नसरीन मुमताज1, डा. जया ठाकुर2, डा.एल.एस.गजपाल3
1शोधार्थी, समाजशास्त्र अध्ययन शाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर(छ.ग.)
2निर्देशक व विभागाध्यक्ष (समाजशास्त्र विभाग), शासकीय महाप्रभु वल्लभाचार्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय, महासमुन्द(छ.ग.)
3सह-निर्देशक व सहायक प्राध्यापक, समाजशास्त्र अध्ययन शाला, पं.रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर(छ.ग.)
*Corresponding Author E-mail: abidkhan51985@gmail, gajpal14@gmail.com
सारांश
प्रस्तुत शोधपत्र में नगरीय परिवेश में मुस्लिम महिलाओं के शिक्षा की स्थिति का अध्ययन, छत्तीसगढ़ महासमुन्द जिले के महासमुन्द नगर के विशेष संदर्भ में विवेचन किया गया है। अध्ययन हेतु महासमुन्द नगर की 312 महिलाओं का चयन दैव-निदर्शन आधार पर किया गया है। अध्ययन हेतु तथ्यों का संकलन साक्षात्कार अनुसूची के माध्यम से किया गया है। अध्ययन से प्राप्त तथ्य ये दर्शाता है कि मुस्लिम लड़कियाँ शिक्षा प्राप्त कर रही है, किन्तु उनकी शिक्षा का स्तर प्राथमिक मिडिल और हाई स्कूल की शिक्षा तक ही सीमित देखा गया है। मुस्लिम महिलाओं में उच्च शिक्षा का स्तर निम्न है। वर्तमान समय में भी मुस्लिम महिलाओं में उच्च शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी है। अतः मुस्लिम महिलाओं को उच्च शिक्षा के प्रति जागरूक करने की नितांत आवश्यकता है ताकि शिक्षा प्राप्त कर वे अपनी समस्याओं का समाधान करते हुये देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।
शब्दकुंजी - मुस्लिम महिला, अशिक्षा, आर्थिक स्थिति, पारिवारिक स्थिति, परंपरागत मान्यताएं
उन्नत और विकसित राष्ट्र कहलाने का गौरव तभी प्राप्त होगा जब महिला भी पुरूषो के समान ही शिक्षित होकर आत्मनिर्भर बनेगी। किसी भी राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक विकास में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शिक्षा के अभाव में विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। आज पूरे विश्व में महिला साक्षरता दर में वृद्धि हुयी है, परन्तु भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जहाँ अधिकाश महिलायें अशिक्षित है। गुरूमूर्ति के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि किसी भी देश के विकास में महिलाआंे की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और साक्त महिलायें सामाजिक विकास में अपना योगदान देती हैं। भारत में 24 करोड़ 50 लाख महिलायें आज भी निरक्षर है एवं 2011 के जनगणना आंकड़ो के अनुसार भारत में 8.4 करोड़ बच्चे शाला नहीं जाते है। शिक्षा विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2015-16 में प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्तर पर लगभग 50 हजार बच्चों ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी है और इसी तरह दसवीं के बाद भी बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्कूल छोड़ रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त विकास करना भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है।
भारत की आबादी में मुसलमान 14ण्23ः है। 2011 के जनगणना आंकड़ो से मुसलमानांे की आर्थिक-शैक्षणिक स्थिति सामने आ गयी है कि भारत का हर चैथा भिखारी मुसलमान है। जिससे स्पष्ट होता है कि मुसलमानांे की आर्थिक स्थिति निम्न है। मुसलमानों के माथे पर सबसे अनपढ़ कौम का कलंक भी लग गया है क्योंकि जनगणना आंकड़ो के अनुसार भारत में सबसे अधिक अनपढ़ 42ण्72ः से भी अधिक मुसलमान हैं। देश में 2ण्8ः मुस्लिम समुदाय के लोग स्नातक हंै। अब का प्रश्न जहां तक मुस्लिम महिलाओं की शिक्षा की स्थिति का है उनकी स्थिति संतोषजनक नहीं है।
शिक्षा का अधिकार प्रत्येक नागरिक का मानवीय अधिकार है। मुस्लिम महिला भी तो मानव है, फिर मुस्लिम महिला को इस शिक्षा के अधिकार से वंचित कर उनके साथ भेदभाव क्यों किया जाता है ? पुरूष प्रधान समाज में मुस्लिम लड़कियांे को शिक्षा से वंचित करने के कई कारण है- लड़के व लड़कियांे में अन्तर करके लड़कियों को विद्यालय न भेजना, बेटियांे को पराया धन के रूप में मान्यता, लड़कियांे को विद्यालय न भेजने की जगह उनसे घरेलू कामकाज करवाना, आर्थिक तंगी, परम्परागत पिछड़ी सोच व रूढ़िवादिता, शिक्षित लड़कियांे के समकक्ष शिक्षित लड़के न मिल पाने के कारण उनके विवाह में समस्या होती है। लड़कियांे की शिक्षा के बारे में माता-पिता यह सोचते हंै कि उन्हें शिक्षित करके आर्थिक रूप से भला क्या लाभ होगा ? कुछ लोगो का मानना है कि लड़कियाॅं पढ़ लिखकर खराब व्यवहार करने लगती है। अतः मुस्लिम परिवारों में लड़कियांे की शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता है।
सिगनपोरिया मुनीरा का अध्ययन बाम्बे व पुणे की 100 मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं पर आधारित है। प्रस्तुत अध्ययन स्पष्ट करता है कि अधिकांश मुस्लिम महिलायंे कम शिक्षित हैं और समाज के निम्न वर्ग से सम्बन्धित है, इसलिये वे आर्थिक तंगी व सामाजिक समस्याआंे से ग्रस्ति है। अध्ययन से जानकारी प्राप्त होती है कि मुस्लिम महिलाओं की देखभाल, सहायता व उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिये प्रयास करना पड़ेगा।
मुस्लिम महिलाआंे के सर्वांगीण विकास के लिय उनका शिक्षित होना अति आवश्यक है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम महिला शिक्षित नहीं होगी तो वह न तो सफल गृहणी बन सकेगीं और न कशल माता। अगर एक माँ ही अशिक्षित होगी तो वह अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन करके उनका मानसिक विकास कैसे कर पाएगीं और एक सभ्य मुस्लिम समाज का निर्माण एवं विकास सम्भव नहीं हो सकेगा। शिक्षा से महिलाओ में अनेक गुणों का समावेश होता है जैसे- मस्तिष्क का विकास, स्वास्थ्य में सुधार, अपने गृहस्थ जीवन की सुचारू रूप से देखभाल करना, आत्मनिर्भरता, व्यवहार में कुशल होना आदि। उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने मुस्लिम समुदाय को बदल रहें समय के साथ चलने तथा अपने सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन से निजात पाने के लिये आधुनिक शिक्षा को अपनाने का आग्रह किया है। मुस्लिम समुदाय के सामने शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आर्थिक चुनौती है। मुस्लिम समुदाय की तरक्की समृद्धि एवं सशक्तिकरण में शिक्षा की कमी ही सबसे बड़ी बाधा है। इस्लाम में शिक्षा और सीखने की प्रक्रिया को अधिक महत्व दिये जाने के बावजूद भारत में कई मुस्लिम समुदाय ने लम्बे समय तक शिक्षा की आवश्यकता को नजर अंदाज किया और इस तरह उन्होने ज्ञान की अवहेलना की है।
अल्पसंख्यको के कल्याण के लिये शासकीय प्रयासः-
अल्पसंख्यको (मुसलमानों ) के कल्याण के लिये किये जा रहे शासकीय प्रयास निम्नानुसार है:-
छात्रवृत्ति योजना, निःशुल्क पाठ्यपुस्तक वितरण, गणवेश वितरण, मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था, सरस्वती सायकल योजना, निःशुल्क कोचिंग की व्यवस्था, शैक्षणिक ़ऋण योजना, उर्दू शिक्षण के लिये और अधिक संसाधन, मदरसा शिक्षा आधुनिकीकरण, मौलाना आजाद शिक्षा प्रतिष्ठान के माध्यम से शैक्षिक अधोसंरचना को उन्नत करना आदि।
शासन द्वारा चलायी जा रही योजनाओ से मुस्लिम महिलाओं तथा बच्चों के जीवन स्तर में सुधार हो रहा है।
अहमद शकील और मलिका का अध्यन मुस्लिम महिलाओं के परिवर्तन से सम्बन्धित है। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक प्रथा अधिकांश मुस्लिम महिलाओं को आगे बढ़ने में बाधा उत्पन्न करती है। प्रस्तुत अध्ययन पूणे शहर पर आधारित है। प्रस्तुत अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षित माता-पिता अपने परिवार के सदस्यों को अच्छी शिक्षा के लिये प्रेरित करते है और शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रो के लिये उन्हें सभी सुविधाये प्रदान करते हैं क्योंकि उन्हें इस बात की जानकारी है कि सामाजिक, आर्थिक, विश्वस्तर पर अपने आप को स्थापित करने के लिये दुनिया के साथ-साथ कदम मिलाकर चलने के लिये शिक्षा ही आवश्यक है।
कुलदीप कौर का मानना है कि शिक्षा के कारण मुस्लिम महिलाओं के जीवन स्तर में सुधार हो रहा हैं कुछ मुस्लिम महिलायें राजनीति में भी आगे आने लगी हंै, और यह सब आधुनिकीकरण का प्रभाव है।
मध्यम तथा उच्च आर्थिक स्थिति वाले परिवारो में मुस्लिम महिलाआंे की शैक्षणिक स्थिति अच्छी होती है, किन्तु निर्धन मुस्लिम परिवारांे की महिलायें आज भी अशिक्षित हैं। अशिक्षा के कारण ही मुस्लिम महिलाआंे में जागरूकता की कमी है और ये अपने अधिकारो से भी वंचित हैं।
उद्देश्य:-
1. मुस्लिम महिलाआंे की शिक्षा की स्थिति को ज्ञात करना।
2. शासन द्वारा मुस्लिम महिलाआंे की शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिये किये जा रहे शासकीय प्रयत्नो को ज्ञात करना।
परिकल्पना:-
मुस्लिम निर्धन परिवारो की तुलना में मध्यम तथा उच्च आर्थिक स्थिति वाले परिवारों में मुस्लिम महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति अच्छी होती है।
अध्ययन क्षेत्र का परिचय:-
अध्ययन के लिये महासमुन्द जिले के महासमुन्द नगर का चयन किया गया है। यह छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर से 55 किमी. की दूरी पर स्थित है।
उत्तरदाताओं का चयन:-
अध्ययन हेतु प्रस्तावित 24 वार्ड में 624 मुस्लिम परिवार निवासरत् है। अध्ययन हेतु प्रत्येक वार्ड के 50 प्रतिशत परिवारांे से महिलाआंे का चयन उत्तरदाता के रूप में किया गया। इस प्रकार 624 परिवारो में से 312 का चयन दैव निदर्शन प्रविधी के लाॅटरी प्रणाली के माध्यम से किया गया है।
तथ्य संकलन की प्रविधि एवं उपकरण:-
प्रस्तुत अध्ययन कार्य के लिये साक्षात्कार अनुसूची का प्रयोग किया गया है।
उपरोक्त तथ्यो के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि 62 (20 प्रतिशत) उत्तरदाता महिलाएँ अशिक्षित हंै और अधिकांश 79 (25 प्रतिशत) उत्तरदाता महिलाओ का शैक्षणिक स्तर प्राथमिक है तथा 11 (3.5 प्रतिशत) उत्तरदाता महिलाएँ स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त है। अध्ययन से ज्ञात होता है कि मुस्लिम महिलाआंे में भी शिक्षा का प्रसार हो रहा है किन्तु मुस्लिम महिलाओं की उच्च शिक्षा की स्थिति निम्न है। मुस्लिम महिलाओं में अभी भी उच्च शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी है।
उत्तरदाता के परिवार के सदस्यो की शैक्षणिक स्तर संबंधी सारणी से यह स्पष्ट होता है कि सर्वाधिक 312 (21.05 प्रतिशत) सदस्य प्राथमिक शिक्षा ग्रहण किए हैं, 299 (20.18 प्रतिशत) सदस्य मिडिल, 258 (17.41 प्रतिशत) सदस्य हाईस्कूल, 191(12.89 प्रतिशत) सदस्य स्नातक, 162(10.93 प्रतिशत) सदस्य हायर सेकेण्डरी, 106 (7.15 प्रतिशत) सदस्य शिक्षा प्रारम्भ नहीं किये हंै, 85(5.73 प्रतिशत) सदस्य स्नातकोत्तर, 69(4.65 प्रतिशत) सदस्य अशिक्षित हैं। अतः सारणी से स्पष्ट होता है कि मुस्लिम परिवारांे में शिक्षा का प्रसार हो रहा है किन्तु अधिकांश सदस्यांे की शिक्षा प्राथमिक तथा मिडिल स्कूलो तक ही सीमित है। स्नातकोत्तर तक शिक्षा सबसे कम सदस्यांे ने प्राप्त की है।
उपरोक्त तथ्यो के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि अधिकांश 291 (93.3 प्रतिशत) उत्तरदाताआंे का मानना है कि लड़कियांे की समाज में निम्न स्थिति का कारण अशिक्षा है और 21(6.7 प्रतिशत) उत्तरदाताओं का मानना है कि लड़कियों की समाज में निम्न स्थिति का कारण अशिक्षा नहीं है।
अध्ययन से प्राप्त तथ्य यह दर्शाते है कि मुस्लिम लड़कियों की समाज में निम्न स्थिति का एक कारण अशिक्षा है।
तालिका के विश्लेषण से स्पष्ट है कि सर्वाधिक 35.9 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं इस बात से सहमत है कि मुस्लिम समुदाय मे प्रचलित पर्दा प्रथा, 26.9 प्रतिशत महिलाओ ने समाज की परंपरागत पिछडी सोंच को तथा 26.6 प्रतिशत महिलाओ ने मुस्लिम परिवारों में व्याप्त निर्धनता को अशिक्षा का मुख्य कारण माना है।
समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से यदि हम प्राप्त तथ्यों का विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट है कि कुछ मुस्लिम परिवारों में अभी भी परंपरागत सोंच कायम है और वे लडकियों की शिक्षा के पक्षधर प्रतीत नही होते है।
निष्कर्ष:-
शिक्षित महिला भविष्य में निराशा एवं शोषण के अंधकार से निकलकर परिवार समाज व राष्ट्र के विकास और उत्थान में अपना उत्तरदायित्व सही अर्थो में स्थापित कर सकती हंै। अध्ययन से यह निष्कर्ष प्राप्त होता है कि अधिकाश उत्तरदाता मुस्लिम महिलायें और उनके परिवार की उच्च शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं है, और अधिकांश उत्तरदाता मुस्लिम महिलाओं का मानना है कि समाज में लड़कियो की निम्न स्थिति का एक कारण उनकी अशिक्षा है। अशिक्षा मुस्लिम महिलाआंे के विकास में सबसे बड़ी बाधा है।
वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर यह अनुभव किया जा रहा है कि महिलाओं की शिक्षा के दिशा में प्रयास के बिना समाज का सन्तुलित विकास सम्भव नहीं है। मुस्लिम लड़कियांे के शिक्षा के विकास में सरकार लगातार प्रयासरत् रही है, और विभिन्न शिक्षा कार्यक्रम तथा नीतियों को लागू कर इनको आवश्यकतानुसार निर्देशित करती रहती हैं और उनका मार्गदर्शन भी करती रहती हैं। सरकार को इस प्रयास में सफलता भी मिली है। तथापि इस दिशा में और अधिक प्रयास करने की नितांत आवश्यकता है।
संदर्भ सूची-
;1द्ध ।ीउमकए ैींाममस ंदक डपेजतलए डंसपांए डवकमतद मकनबंजपवद ंदक ेवबपव.मबवदवउपब बींदहम त्मेमंतबीमते ॅवतसक . श्रवनतदंस व ि।तजे ैबपमदबम ब्वउउमतबम . प् ;1द्ध 2010ए च्ण्139.149
;2द्ध ळनतनउववतजीलए ज्ण्त्ण्ए ैमस िीमसच हतवनच मउचवूमत तनतंस ूवउमदए ज्ञनतनोीमजतंए अवसण् 48ए दवण्05ए थ्मइतनंतल 2000ए च्. 36.39
;3द्ध ज्ञंनतए ज्ञनसकपच य डवकमतदप्रंजपवद रू ज्ीम प्उचंबज वद उनेसपउण् ज्ीम श्रवनतदंस व िैवबपवसवहपबंस ैजनकपमे 4ण् ;श्रंद 1985द्ध च् . 164.168
;4द्ध ैपहंदचवतपंए डनदपतं य प्दकपंद डनेसपउ च्वेज क्पअवतबम च्तवइसमउे ंदक ैवबपंस ैनचचवतजण् ज्ीम प्दकपंद श्रवनतदंस व िैवबपंस ॅवता 54;3द्धए 1993ए च्ण्. 355.363
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;6द्ध ॅमइेपजम . ूूूण्बहउपदवतपजलण्बवउ
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;8द्ध ंनवभारत हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-दिनांक 04 सितम्बर 2016 पृ.क्र.- 4
Received on 03.04.2017 Modified on 12.04.2017
Accepted on 27.04.2017 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Ad. Social Sciences. 2017; 5(2):76-80.